AMU विधि संकाय की ला सोसाइटी द्वारा “सर सैयदः दृष्टि एवं लक्ष्य“ विषय पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन

अलीगढ मीडिया डॉट कॉम, अलीगढ़। अलीगढ़ 12 अक्टूबरः अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के विधि संकाय की ला सोसाइटी द्वारा ‘सर सैयदः दृष्टि एवं लक्ष्य’ विषय पर अंतर्राष्ट्रीय आभासी सम्मेलन का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। सम्मेलन में 14 राष्ट्रों के लोगों ने भाग लिया। मुख्य अतिथि इंजीनियर नदीम ए0 तरीन (व्यवसायी व समाजसेवी) ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि सर सैयद ने भारतीयों की सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक व बौद्धिक विकास के लिए एक अत्यंत दूरगामी दृष्टि अपनाई। उन्होंने लोगों को समझाया कि धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ वैज्ञानिक शिक्षा मनुष्य के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। श्री नदीम तरीन ने कहा कि सर सैयद का ध्येय मात्र एक शिक्षण संस्था स्थापित करना नहीं था, वर्न शिक्षा के द्वारा आने वाली नसलों के भविष्य को सुरक्षित करना था। उन्होंने कहा कि हमें नैतिक शिक्षा पर भी ध्यान देना चाहिए। अंत में उन्होंने प्रतिभागियों का आव्हान करते हुए कहा कि हमें सर सैयद के सपनों को साकार करने की कोशिश करनी चाहिए और आधुनिक शिक्षा को ग्रहण करना चाहिए।

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अपने अध्यक्षीय भाषण मंे अमुवि के पूर्व छात्र एवं अध्यक्ष सिख शिक्षा समिति, सरदार गुरदेव सिंह, आई0ए0एस0 (सेवानिवृत), ने कहा कि कोई भी व्यक्ति अमर नहीं होता परन्तु कुछ लोग अपने विचारों के द्वारा अमर हो जाते हैं। सर सैयद उन्हीं कुछ लोगों में से एक हैं जो अपने अभूतपूर्व कृत्यों से भारतीय इतिहास में अपनी एक अमिट छाप छोड़ गए हैं। ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो समय के विपरीत चलते हैं तथा सर सैयद ऐसे ही एक महापुरूष थे जिन्होंने एक नया प्रगतिवादी दृष्टिकोण अपनाया। वह एक महान विचारक, दार्शनिक, चिन्तक तथा एक महान समाज सुधारक थे जिन्होंने मुस्लिम समाज के उत्थान हेतु जो प्रयास किये उनसे आज हर वर्ग के लोग लाभ प्राप्त कर रहे हैं। उन्होंने भारत के सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक विकास में एक उत्प्रेरक का कार्य किया। सरदार गुरदेव सिंह ने कहा कि यह सभी छात्रों का कर्तव्य है कि वह सर सैयद के आदर्शो को आगे बढ़ाते हुए अपना योगदान दें। उन्होंने अपने सम्बोधन में प्रोफेसर हफीजुर्रहमान, प्रोफेसर मोहम्मद हबीब तथा प्रोफेसर दयाल से जुड़ी हुई यादों का भी जिक्र किया।
विधि संकाय के अधिष्ठाता तथा कंफ्रेंस के डायरेक्टर प्रोफेसर शकील समदानी ने अपने भाषण में कहा कि सर सैयद ने हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द की एक अनोखी मिसाल कायम की तथा एम0ए0ओ0 कालिज को किसी एक वर्ग के लिए सीमित नहीं किया। वह एक निडर व्यक्ति थे जिसका जीता-जागता उदाहरण उनकी पुस्तक “अस्बाब-ए-बगावत-ए-हिन्द“ है जिसमें उन्होंने ब्रिटिश नीतियों की जमकर आलोचना की। सर सैयद एक शिक्षाविद् के साथ-साथ महान कानूनविद्, समाज सुधारक, लेखक, दूरअंदेश व्यक्ति थे। उन्होंने कानून के क्षेत्र में भी बहुत काम किया जो भारतीयों के हित में था। उन्ही की कोशिशों से सिविल सर्विस में भरतीयों के लिए बहुत सी आसानियों पैदा र्हुइं।

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अपने बीजक भाषण में प्रोफेसर एम शाफे किदवई (अध्यक्ष, जन संचार विभाग) ने कहा कि 19वीं शताब्दी में जब भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का युग शुरू हुआ तब सर सैयद भारत के पहले मुस्लिम बुद्धिजीवी थे जिन्होंने नागरिक अधिकार आन्दोलन का सूत्रपात किया। उन्होंने समाज में जागरूकता फैलाने हेतु अनेक पत्रिकाओं का सम्पादन किया। उन्होंने महिला शिक्षा के लिए भारतीय सामाजिक परिस्थियों को देखते हुए गृह शिक्षा आधारित शैक्षणिक प्रारूप प्रसतुत किया जिससे किसी भी स्थिति में महिलाऐं शिक्षा प्राप्त कर सकें। उन्होंने बताया कि सर सैयद कई आयोगों के अध्यक्ष थे तथा उन्होंने अपने अधिकारों का प्रयोग भारतीयों की स्थिति सुधारने हेतु किया। सर सैयद ने भारत के शैक्षणिक विकास हेतु एक सपना देखा तथा उसे पूर्ण करने हेतु हर सम्भव प्रयास किया जिसका परिणाम आज अमुवि के रूप में हमारे सामने है।
डा० लतीफा बिन आरिफा (अध्यक्ष, रिसर्च इनोवेशन इंटरप्रेरियोर एण्ड प्रोसट ग्रेजूएट यूनिट, अल ब्रेमी विश्वविद्यालय ओमान) ने कहा कि सर सैयद के व्यक्तित्व का सर्वाधिक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण यह है कि उन्होंने जीवन में अपने धार्मिक आदर्शों को ध्यान में रखते हुए नए वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाया। उन्होंने मात्र भाषा सीखने के साथ-साथ एक विदेशी भाषा सीखने पर भी बल दिया। सम्मेलन में अतिथियों का स्वागत मोहम्मद नासिर तथा संचालन अब्दुल्ला समदानी, (सेकरेट्री ला सोसाइटी) ने किया। प्रोफेसर मोहम्मद अशरफ ने धन्यवाद ज्ञापित किया।अतिथियों का स्वागत लायबा फातिमा, आकाश रंजन गोस्वामी, शेल्जा सिंह, माहेलका अबरार तथा डा० शाद अहमद (ओमान) ने किया। रिपोर्टियर की जिम्मेदारी फौज़िया, रज़िया चैहान, शौएब अली तथा हुसैन खालिद ने निभाई।

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