पुण्यतिथि पर विशेष#आज की विशुद्ध पत्रकारिता में, शुद्ध पत्रकारिता के प्रतीक दिनेश हितैषी

अलीगढ मीडिया डॉट कॉम,अलीगढ: आज कल की भागा दौडी के समय में लोग ओर बुद्विजीवी वर्ग कहलाऐं जाने वाले पत्रकार जहां तकनीकी साधनों को सहारे तेज हो गये हैं वहीं जग जाहिर है कि वह तेजी असल और समाज का उद्वार करने वाली पत्रकारिता उतीनी ही धीमी हो गई है। लोग जल्दी से जल्दी ज्यादा से ज्यादा लोगों को संपर्क में लाकर अपने संगठन को बडा करने में लगे हुए हैं। इस कार्य को करते हुए इतना सोचना समझने का भी समय नहीं है कि संगठन कितना भी बडा हो परन्तु बिना किसी अच्छे तात्पर के लिए अगर वह नहीं है तो वह समाज को उल्टी दिशा भी दे सकता है।

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यह दरकतो की जगह एक बडी खडी लंबी बल्ली के समान है जहां जो आकर सीढी लगाए और अपने सिद्वात और सही गलत विचार धारा का बैनर टांग के चला जाए माना की बल्ली तूफांन में गिरती नहीं है पर उसका दरक से तुलना करना अपनी मूर्खता पूर्ण ही तो है आज कल की इसी भागम दौड वाली विशुद्व पत्रकारिता में शुद्वता को बचाने के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाला साहित्यकारों और पत्रकारों का छोटा भाई और श्रमजीवी पत्रकारो का बडा भाई कहे जाने वाले छोटे हितैषी अर्थात दिनेश हितैषी की आज पुण्यतिथि है ऐसे व्यक्तित्व की ही पुण्यतिथि को स्मरण तिथि मानकर मनाने से भी समाज का कल्याण हो जाता है वेा प्रेम समाज की सहभागिता और समाज के हर अच्छे बुरे जरूरी क्रिया क्लापों में स्वार्थ को कोसौं दूर रखते हुए सूचने वाले व्यक्ति थे उन्हे कईबार अलग अलग संस्थाओं द्वारा अलीगढ रत्न की उपाधि से सम्मानित किया गया। पत्रकारों, साहित्यकारों और जनप्रतिनिधियों में इतने प्रसिद्व थे कि समाज का हर छोटा बडा व्यक्ति और गणमान्य व्यक्ति अपने छोटे बडे अह्म फैसलों को लेने पूर्व छेटे हितैषी जी की के पास आ जाया करते थे।

महान् स्वत्रंतता सैनानी एवं क्रातिकारी स्व0श्री मदनलाल हितैषी जी के छोटे बडे कुल मिलाकर इकलौते पुत्र परिवार में सबसे बडे बच्चे थे। हितैषी जी के स्र्वगवास के समय मात्र 16 वर्ष की आयु ही थी और उनसे छोटी तीन बहने गीता, नीरा और रंजनी बाल्य अवस्था में जिनकी जिम्मेवारी भी छोटे हितैषी के कंधों पर आ गई थी साथ में इतना बडा प्रकाश ’’ दैनिक प्रकाश’’ जो हितैषी जी की मशाल और मिशन को आगे बढ़ाने की जिम्मेवारी भी छोटे से बालक के कंधों पर आ गई। इतने बडी हितैषी क्रातिकारी और सैनानी प्रवत्ति के थे उतने ही छेटे हितैषी सौम्य और धैर्यबान शायद ये उन बडी-बडी जिम्मेवारियों का असर था। ये उस समय की बात है जब अखबार मिशन के रूप में निकलता था और मिशन को चलाने वाले व्यक्ति समाज के और मिशन के लिए अपना सरवस्य समर्थित करके हर जगह समाज गलत क्रिया कलापों का विरोध और सर्वसमाज की पेरोंकारी करते थे। ऐसे समय में उस बालक ने उन जिम्मेदारियों को मन में रखा और आगे बढ़ता चला गया।

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प्रैस के कुछ पुराने लोगों के मुताबक अखबार जब छपता था जब शाम तक कहीं से कागज व अन्य सुविधाओं के लिए पैसों की सुविधा हो जाती थी। आज के समय में यह सोचना भी अचंभित करने वाला होगा कि कोई व्यक्ति महान् पिता की जिसके लिए समाज के लोग लडने मरने के लिए तैयार हो जाए कि प्रतिमा स्वंय न लगने दें और तो और उनके नाम लगे बोर्ड स्वंय पत्र लिखकर प्रशासन से हटवा दिये हुआ यूं कि हितैषी जी के मरणोपरांत मलखान सिंह के दूसरे गेट से लेकर बारहद्वारी चैरीाहे तक श्री मदनलाल हितैषी मार्ग उनकी प्रसिद्व और अच्छे कार्य और सम्पर्ण को देखते हुए नाम रख दिया और दोनों किनारों पर श्री मदनलाल हितैषी के नाम से लोहे के बोर्ड लगवा दिये गये और हितैषी जी की गली के बाहर उनके नाम का पत्थर, कुछ वर्षो बाद मलखान सिंह अस्पताल के बाहर लगे बोर्ड के नीचे कूडा पडने लगा और बोर्ड की आड में लागों ने अपनी दुकानों और खोकों को लगा लिया। बारहद्वारी चैराहे लगे बोर्ड से भी बडे-बडे वाहनों को आवागमन में परेशानी होने लगी जब यह बात स्व0 श्री दिनेश चन्द्र हितैषी के कानों में पडी तो उन्होने स्वंय प्रशासनिक अधिकारियों को फोन करके दोनों बोर्डो को हटवा दिया।
वहीं बारद्वारी चैराहे पर प्रशासन द्वारा स्व0 श्री मदनलाल हितैषी जी कि मूर्ती लगाये जाने का आॅर्डर पास है लेकिन वहां छोटा चैराहा होने की बजह से लोगो को दिक्कत न आये स्वंय उन्होने कहकर उस मूर्ती को नहीं लगने दिया। अलीगढ़़ मंडल और आस-पास के क्षेत्र शायद ही कोई श्रमजीवी पत्रकार व साहित्यकार व लेखक ऐसा होगा जिसकी उन्होने मदत न कि हो या जो उन्हे बडा भाई ना मानता हो ऐसे हजारों किस्से हैं जो लोगों द्वारा उनके बारे में सुनाए जाते हैं जिन्हे कलम से एक लेख में लिख देना संभव नहीं ऐसे उज्जस्वी व्यक्तिव का समाज में कम हो जाना एक बहुत बडी समाज के लिए हानि है।

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