नरेन्द्र मोदी के मुस्लिम समर्थकों मे बैचैनी… मुस्लिम मोदी भक्तों में निराशा क्यों?

डा जसीम मोहम्मद, अलीगढ: 2014 से पहले जब चुनावों का माहौल था तो अल्पसंख्यकों के बीच एक एैसा वातावरण था कि यदि भाजपा और नरेन्द्र मोदी चुनाव जीत जाते हैं तो उनका भविष्य अन्धकारमय हो जायेगा। एैसे तनावपूर्ण और निराशाजनक समय मे भी कुछ मुसलमान नरेन्द्र मोदी के समर्थन में सामने आए और उन्होंने खुलकर मोदी का प्रचार प्रसार किया जिनमें प्रसिद्ध फिल्म लेखक सलीम खान, प्रसिद्ध फिल्मी कलाकार सलमान खान, प्रमुख व्यापारी जफर सरेशवाला और अलीगढ़ के समाजिक कार्यकर्ता तथा लेखक डॉ0 जसीम मोहम्मद प्रमुख है। उपरोक्त लोगों ने नरेन्द्र मोदी को खुलकर समर्थन किया हॉलाकि उन्हें अपने समाज के बीच त्रीव विरोध का सामना करना पड़ा।
जब नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमन्त्री पद की शपथ ले ली उसके बाद इन लोगों ने प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों का प्रचार प्रसार मुसलमानों के बीच करना आरम्भ किया। जफर सरेशवाला ने प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों को न केवल टीवी पर अपना समर्थन दिया बल्कि देश के विभिन्न भागों मे शैक्षिक सेमीनार आदि आयोजित करके भी प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को व्यक्तित्व और छवि को उभारने की कोशिश की। जफर सरेशवाला का भाग्य अच्छा था कि उन्हें हैदराबाद स्थित मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनीवर्सिटी का कुलाधिपति नियुक्त किया गया।
जैसे जैसे भारतीय राजनीतिक आगे बढ़ती गई प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी देश के जनता के बीच ही नहीं लोकप्रिय होते गए बल्कि अल्पसंख्यकों विशेषरूप से मुसलमानों का भी एक बड़ा भाग उनसे जुड़ता गया। लेकिन इस दौरान प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के मुस्लिम समर्थक हाशिये पर चले गए। उन्हें मोदी भक्त का कोई लाभ नहीं हुआ और दूसरी ओर वे अपने समाज मे भी बदनाम होते गए। जफर सरेशवाला ने अपने दुख को टीवी साक्षत्कार में भी व्यक्त किया जब उन्होंने साफ तौर पर कहा कि मोदी ने उन्हें इस्तेमाल किया।
इसी प्रकार अलीगढ़ के डॉ0 जसीम मोहम्मद ने प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के जीवन और कार्यों पर न केवल एक दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखी बल्कि उन्होंने प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों के समर्थन में सेमीनार आदि आयोजित करके अलीगढ़ जैसे बौद्धिक नगर मे प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के लिए एक जमीन तैयार की। केवल यही नहीं उन्होंने नीतियाँ मुसलमानों के लिए सकारात्मक है। डॉ0 जसीम मोहम्मद ने अपने व्यक्गित साधनो द्वारा नरेन्द्र मोदी स्कॉलरशिप फॉर मुस्लिम स्टूडेन्टस जारी की जो मुसलमानों के बीच काफी लोकप्रिय हुई परन्तु उन्हें भी निराशा ही हाथ लगी। हॉलाकि जसीम मोहम्मद की प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी से दो बार भेंट हुई परन्तु विगत एक वर्ष से वे भी प्रधानमन्त्री से भेंट का समय नहीं ले पाए। हॉलाकि इस सम्बन्ध में डॉ0 जसीम मोहम्मद का कहना है कि उन्होंने प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का समर्थन किसी लालच में नहीं बल्कि देश और समाज हित मे किया था और वे यह समर्थन जारी रखेगें। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और मुसलमानों के बीच एक पुल की भाति कार्य करना का था।
लेकिन तथ्य यह है कि यदि उन्हें सरकार अथवा प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी से कोई सकारात्मक लाभ नहीं होता तो उन्हें काग्रेंस अथवा क्षेत्रीयदल अपनी ओर खींच सकते हैं उसके दो कारण है। पहली बात तो यह है कि वे पूर्व मे काग्रेंस समर्थक रहे है और विभिन्न विधान सभा तथा लोकसभा चुनावों मे फ़िल्म निदेशक महेश भट्ट के साथ काग्रेंस के समर्थन मे प्रचार अभियान भी चला चुके हैं और दूसरा यह कि वे उदारवादी मुसलमान है जो अलीगढ़ से कार्य करते हैं और उनके ऊपर सामाजिक दवाब रहता है कि वे प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का समर्थन बन्द करे।
अब जब कि आगामी लोकसभा चुनाव २०१९ काफी नज़दीक है तब प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के इन मुसलमान समर्थकों को अपनी ओर खीचने के लिए विभिन्न राजनीतिक दल प्रयत्नशील है इस तथ्य को भी ध्यान मे रखना आवश्यक है कि उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृष्य पर प्रियंका गान्धी के आगमन से ज़मीनी सतह पर राजनीति बदल रही है। इस समय यह हो सकता है कि निराश हो कर कुछ मुस्लिम मोदी भक्त राजनीतिक पाला बदल लें।
(…लेखक अलीगढ मुस्लिम विश्व विद्यालय के पूर्व मीडिया सलाहकार है)

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