शासन-प्रशासन में सुधार की संभावना में व्यापक स्तर पर सुधार कठिन तो है किंतु असंभव नहीं

प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम”, लखनऊ: स्वाभाविक है कि अपने चारों ओर अकर्मण्यता, ढिलाई, विचलन, स्वार्थपरता और भ्रष्टाचार का बोलबाला देखकर मनुष्य अतिशय निराश हो जाता है. सोचता है, इतनी व्यापक विकृति में प्रभावी सुधार की कोई गुंजाइश नहीं. वह पीछे मुड़कर देखता है तो अपने जीवनकाल में ही साल दर साल गिरावट महसूस करता है. उसे लगता है, आगे भी विकृति बढ़ती जाएगी. कोई उपाय न देखकर वह भी बहती गंगा में हाथ धोने उतर पड़ता है.

पुराणों में चतुर्युग की अवधारणा निराधार भले हो, मनुष्य के मनोविज्ञान से बहुत मेल खाती है. इस अवधारणा के अनुसार काल की गति हमेशा पतन की ओर उन्मुख होती है. सत्ययुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग; कलियुग के अंत में कल्कि अवतार, फिर सीधे सत्ययुग. कल्पांत में प्रलय के बाद भी शुरुआत सत्ययुग से ही होनी है. सृष्टि के पूरे दौर में काल को पतनोन्मुख ही रहना है. ग़लत या सही, अधिकांश लोग ऐसा ही महसूस भी करते हैं. बूढ़ों की याद में उनका बचपन स्वर्ण काल था, फिर लगातार गिरावट. पीढ़ियों का संघर्ष इसी मनोविज्ञान से आता है. अपनी जवानी में एक से एक ख़ुराफात कर चुके बूढ़े भी नई पीढ़ी के जवानों को नैतिक रूप से गिरा हुआ घोषित करते रहते हैं और उनकी चाल-चलन को लेकर उपदेश देते सुने जाते हैं.

…व्यापक स्तर पर सुधार कठिन तो है किंतु असंभव नहीं
मोटे तौर पर मनुष्यों की तीन श्रेणियाँ होती हैं, हमेशा रहेंगी. एक, वे जो कभी पथभ्रष्ट नहीं होंगे, कुछ भी हो जाए. दो, वे जो कभी नही सुधरेंगे, कुछ भी हो जाए. और तीन, वही जो देखादेखी वाले, बहती गंगा में हाथ धोनेवाले हैं. बहुसंख्यक वही होते हैं और वे माहौल देखकर इधर से उधर पाला बदलते रहते हैं. वे क़ानून से डरते हैं, आदतन उसके उल्लंघन की ओर प्रवृत्त नहीं होते. जब देखते हैं कि दूसरा उल्लंघन करके मज़े ले रहा है तो उनकी भी ललक जाग उठती है. उनके लिए माहौल बना देना ही पर्याप्त है. राज्य पहली श्रेणी, जो कभी पथभ्रष्ट नहीं होंगे, का जितना अधिक से अधिक उपयोग सार्वजनिक उत्तरदायित्व के लिए कर सके, उतना ही राज्य का और सबका भला होगा.

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और दूसरी श्रेणी, जो कभी नहीं सुधरेंगे, के लिए कानूनी बंदिशें और सख़्त व निश्चित दंड-व्यवस्था के अलावा और कोई उपाय नहीं. वे जितना ही सलाखों के भीतर रहें, समाज के लिए उतना ही बेहतर. समाज को अपनी सुख-शांति के लिए उन्हें बैठाकर खिलाने के अलावा और कोई चारा नहीं—सलाखों के भीतर रहकर वे कुछ कर दें तो उनकी इनायत. और तीसरी श्रेणी, बहती गंगा में हाथ धोनेवाले बहुसंख्यक? राज्य की सफलता का सारा दारोमदार इस पर है कि वह इस श्रेणी के लोगों को विचलन से कितना बचा पाता है. ऊपर से नीचे तक माहौल बनाकर उनके विचलन को कम किया जा सकता है. राज्य को और सब भूलकर अपनी सारी ऊर्जा इसी पर लगानी है.

विचारधारा कोई भी लाइए, उसके अमल में मानव-स्वभाव पर आधारित यह मूल समस्या बनी ही रहनी है. लेकिन यह जितना आसान दिखता है उतना है नहीं. समस्या यह कि जब विकृति इतनी व्यापक हो तो सुधार की धारा ऊपर से नीचे की ओर ही प्रवाहित हो सकती है. निर्भर इस पर करेगा कि ऊपर के लोग पहली श्रेणी के हैं, या दूसरी के, या तीसरी के.

…बात यहाँ आकर टूटती है कि ऊपर पहली श्रेणी के लोगों को पहुँचाएँगे कैसे?
इसका कोई उपाय तिवारी जी ने नहीं बताया. शायद उनके पास था भी नहीं। जब कोई उपाय ही नहीं तो सब कुछ उसी पर निर्भर करेगा जिसे संयोग, भाग्य वगैरह के नामों से जाना जाता है. उसी को ईश्वर भी कहते हैं। मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी। वैसे देश में बहुत बड़े-बड़े दिमाग़ इस दिशा में लगे हुए हैं. हमेशा लगे रहते हैं. सारा हो-हल्ला, सारी धमाचौकड़ी इसी के नाम पर चल रही है. फ़ेसबुक पर भी इन लोगों से नि:सृत ज्ञान-वर्षा निरंतर जारी है. देखिए, शायद ये कभी सफल हो जाएँ और कोई समाधान निकल आए. आख़िर इतिहास के अनेक दौर में स्वर्णकाल का ज़िक्र आता है न?

फ़िलहाल रास्ता यही है. और कठिन है. लेकिन इधर-उधर भटकने से तो बेहतर है कठिन रास्ते पर चलने की तदबीर में जुटे रहें. हथौड़ी की चोट पर चोट जारी रहे तो ताले को किसी न किसी दिन खुल ही जाना है.

(…यह लेखक के निजी विचार है, संपादक का इससे सहमत होना जरूरी नहीं है)
लेखक: प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम”
युवा लेखक/स्तंभकार/साहित्यकार
लखनऊ, उत्तर प्रदेश

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