‘उर्दू साहित्य एवं आलोचना में एएमयू के विद्वानों का योगदानः अंग्रेजी विभाग की भूमिका’ पर प्रोफेसर आसिम सिद्दीकी का व्याख्यान

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अलीगढ मीडिया डॉट कॉम, न्यूज़ ब्यूरो, अलीगढ़, 7 अगस्तः भारतीय डायस्पोरा वाशिंगटन डीसी मेट्रो ने ‘उर्दू साहित्य और आलोचना में एएमयू के विद्वानों का योगदानः अंग्रेजी विभाग की भूमिका’ विषय पर एक ऑनलाइन व्याख्यान का आयोजन किया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर मोहम्मद असीम सिद्दीकी ने आजादी का अमृत महोत्सव के अवसर पर आयोजित इस व्याख्यान में सम्बोधित किया।

एएमयू, और विशेष रूप से अंग्रेजी विभाग में साहित्यिक परिदृश्य के अपने व्यापक अवलोकन की शुरुआत करते हुए, प्रोफेसर सिद्दीकी ने कहा कि आज, जब हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, उर्दू साहित्य और आलोचना में विभाग के योगदान के इतिहास के दस्तावेजीकरण के बारे में चर्चा बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। यह जानते हुए कि उर्दू के प्रचार में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से योगदान देने वाले महत्वपूर्ण नामों की एक लम्बी सूची है, उन्होंने 1947 से उर्दू लेखकों और कवियों और उनके कार्यों के बारे में चर्चा की।

उन्होंने कहा कि कैसे अंग्रेजी विभाग के शिक्षक उर्दू कविता, कथा, नाटक, आलोचना और अंग्रेजी में अनुवाद के सृजन में सबसे आगे रहे हैं। उन्होंने प्रोफेसर ख्वाजा मंजूर हुसैन, डॉ सलामतुल्ला खान, प्रोफेसर असलूब अहमद अंसारी, प्रोफेसर मसूदुल हसन, प्रोफेसर जाहिदा जैदी, प्रोफेसर मकबूल हसन खान, डॉ अमीन अशरफ, प्रोफेसर मोहम्मद यासीन, प्रोफेसर एस विकार हुसैन, प्रोफेसर फरहतुल्ला खान, प्रोफेसर शहनाज हाशमी, प्रोफेसर नजमा महमूद, प्रोफेसर ए आर किदवई, प्रोफेसर सैयद आसिम अली और प्रोफेसर अतिया आबिद के कार्यों और योगदान का उल्लेख किया।

प्रोफेसर सिद्दीकी ने कहा कि आज उर्दू अनुवाद और आलोचना की लोकप्रियता के लिए कई कारक जिम्मेदार हैं जिनमें इंटरनेट, अंग्रेजी अध्ययन की प्रकृति में बदलाव और अनुवाद प्रकाशित करने के लिए तैयार बड़े और छोटे प्रकाशकों की उपलब्धता शामिल है। उन्होंने बताया कि फैज अहमद फैज ने अपनी कविता ‘ये दाग दाग उजाला ये शब गजीदा सहर’ का पहला मसौदा स्वयं ख्वाजा मंजूर हुसैन को भेजा था, जिसे उन्होंने अलीगढ़ में कई कार्यक्रमों में पढ़ा।

प्रोफेसर सिद्दीकी ने प्रोफेसर ख्वाजा मंजूर हुसैन, डॉ सलामतुल्ला खान, प्रोफेसर असलूब अहमद अंसारी और प्रोफेसर जाहिदा जैदी के योगदान पर विस्तार से चर्चा की। रूसी नाटककारों का उर्दू में अनुवाद करने में ख्वाजा मंजूर हुसैन के महत्वपूर्ण योगदान और इकबाल और उर्दू की ग़ज़लों पर उनके कार्यों की विशेष रूप से प्रोफेसर सिद्दीकी ने प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि डॉ सलामतुल्ला खान की हेमिंग्वे, अमेरिकी अदब का मुख्तसर जायजा और मजाज का अल्मिया और दूसरे मजामीन शीर्षक वाली किताबें उनकी विशेष शैली और रिच कंटेंट के लिए उल्लेखनीय हैं। उन्होंने गालिब, इकबाल, उर्दू उपन्यास, उर्दू ग़ज़लों और उनके संस्मरण और रेखाचित्रों पर विभिन्न पुस्तकों में प्रकाशित प्रोफेसर असलूब अहमद अंसारी के व्यापक स्कालरशिप पर चर्चा की।

प्रोफेसर सिद्दीकी ने कहा कि अंग्रेजी विभाग से जुड़े सभी लेखकों और कवियों में से, प्रोफेसर जाहिदा जैदी के साहित्यिक कार्यों का जीवन लंबा होगा क्योंकि उनके नाटकों को अंग्रेजी अनुवादों के माध्यम से नए जीवन का आनंद मिलेगा। उन्होंने उनके कई नाटकों में एब्सर्डिस्ट तकनीक के इस्तेमाल पर चर्चा की। प्रोफेसर सिद्दीकी ने उनके नाटकों ‘बहुत दूर तक रात होगी’, ‘सहरा-ए-आज़म’, उनके उपन्यास ‘इंकलाब का एक दिन’ और उनके विभिन्न कविता संग्रहों में प्रोफेसर जैदी की विषयगत और शैलीगत चिंताओं पर भी प्रकाश डाला और उनकी नज़्म और कविता का पाठ किया।

उन्होंने डॉ सलामतुल्ला खान, प्रोफेसर मसूदुल हसन और प्रोफेसर नजमा महमूद के कार्यों के अंश और कविताएं भी पढ़ीं।

इससे पहले स्वागत भाषण में एएमयू के अंग्रेजी विभाग की प्रोफेसर नाजिया हसन ने कहा कि अलीगढ़ हमेशा से संस्कृति और साहित्य का केंद्र और मंच रहा है।

भाषा विज्ञान विभाग के डॉ. मसूद अली बेग ने अपने समापन भाषण में अलीगढ़ के साहित्यिक और सांस्कृतिक संदर्भ पर प्रकाश डाला। उन्होंने दकनी उर्दू में प्रोफेसर मसूद हुसैन खान, प्रोफेसर खतीब एस. मुस्तफा और डॉ नादिर अली खान के योगदान पर भी बात की।

प्रश्न-उत्तर सत्र में, 125 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया, जिनमें प्रोफेसर एमिरिटा फ्रांसिस प्रिटचेट, प्रोफेसर अनीसुर रहमान, डॉ सैयद आमिर, सुश्री कमर रहमान, सुश्री हमीदा जैसे प्रसिद्ध विद्वान शामिल थे, इस सत्र में उर्दू साहित्य से सम्बंधित कई महत्वपूर्ण मुद्दों को भी उठाया गया। कला संकाय के डीन प्रोफेसर इम्तियाज हसनैन ने शुरू से अंत तक अपनी उपस्थिति से इस अवसर की शोभा बढ़ाई।

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एएमयू में स्तनपान सप्ताह मनाया गया

अलीगढ़, 7 अगस्तः अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यलय के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के सामुदायिक चिकित्सा विभाग द्वारा ‘विश्व स्तनपान सप्ताह’ के उपलक्ष में ‘स्तनपान के लिए कदम उठाएंः लोगों को शिक्षित करें और उनको सहयोग दें’ विषय पर आयोजित कार्यशाला में मेडिकल और नर्सिंग छात्रों को बच्चों और माताओं के स्वस्थ्य पर स्तनपान क प्रभावों और इसके लाभों के बारे में बताया गया।

समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत करते हुए, प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ, डॉ हमीदा तारिक ने कहा कि माँ का दूध शिशुओं के लिए पोषण का सबसे अच्छा स्रोत है क्योंकि यह उन्हें छोटी और लंबी बीमारियों तथा अस्थमा, मोटापा, टाइप 1 मधुमेह और अचानक शिशु मृत्यु सिंड्रोम (एसआईडीएस) जैसी बीमारियों से बचाता है। स्तनपान करने वाले शिशुओं को कान में संक्रमण और पेट में कीड़े होने की संभावना भी कम होती है।

उन्होंने बताया कि उरुग्वे, स्वीडन और ओमान जैसे स्तनपान के उच्च प्रसार वाले देशों में माताओं और उनके बच्चों के बीच घनिष्ठता बढ़ रही है।

डॉ हमीदा ने मेडिकल और नर्सिंग छात्रों से माताओं को अपने बच्चों को स्तनपान कराने के लिए प्रेरित करने का आग्रह किया।

मानद अतिथि, मेडिसिन फैकल्टी के डीन, प्रोफेसर राकेश भार्गव ने कहा कि स्तनपान से माताओं के लिए भी स्वास्थ्य लाभ होता है क्योंकि यह देखा गया है कि शिशुओं को स्तनपान कराने वाली माताओं को कुछ प्रकार के कैंसर, टाइप 2 मधुमेह और उच्च रक्तचाप विकसित होने का खतरा कम होता है। उन्होंने मेडिकल कॉलेजों में ब्रेस्ट मिल्क बैंक विकसित करने का भी सुझाव दिया।

स्वागत भाषण में कार्यक्रम की आयोजन अध्यक्ष और सामुदायिक चिकित्सा विभाग की अध्यक्ष, प्रोफेसर सायरा महनाज़ ने नवजात शिशुओं में प्रतिरोधात्मक क्षमता को बढ़ावा देने और माताओं को अन्य अतिरिक्त लाभों के लिए इष्टतम स्तनपान कराने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि शिशु के जीवन के पहले 6 महीनों के लिए विशेष रूप से स्तनपान कराने के बाद 2 साल और उससे अधिक समय तक उचित पूरक खाद्य पदार्थों के साथ स्तनपान जारी रखना, बच्चों को सर्वाेत्तम स्वास्थ्य प्रदान करता है।

कार्यशाला के एक वैज्ञानिक सत्र में, डॉ एम सलमान शाह ने विशेष स्तनपान के महत्व और माताओं और शिशुओं के लिए इसके कई लाभों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि माँ का दूध शिशुओं के लिए विभिन्न संक्रमणों के खिलाफ एक टीकाकरण की तरह है और यह उनके पोषण के लिए उपलब्ध सर्वाेत्तम और सस्ता तरीका भी है।

प्रोफेसर तबस्सुम नवाब ने बताया कि किस प्रकार सफल स्तनपान शिशुओं की स्थिति और स्तन से उनके लगाव पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा कि जब शिशुओं को सही स्थिति में रखा जाता है और सही तरीके से जोड़ा जाता है, तो वे अच्छी तरह से स्तनपान करेंगे और माताओं को कोई तकलीफ भी नहीं होगा। जैसे ही स्तनपान शुरू होता है, कुछ माताओं को असुविधा महसूस हो सकती है लेकिन उन्हें समय के साथ इसकी आदत हो जाती है।

डॉ सुबूही अफजाल ने जोर देकर कहा कि स्तनपान के संबंध में कई मिथक हैं और यह समझना महत्वपूर्ण है कि स्तनपान की अवधि नवजात शिशुओं और माताओं दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। इस अवधि में, माताओं को परिवारों और देखभाल करने वालों से सहायता और प्रोत्साहन प्रदान किया जाना चाहिए।

डॉ अली जाफर आब्दी ने देश और दुनिया भर में स्तनपान को बढ़ावा देने वाली विभिन्न एजेंसियों और संगठनों के कार्यों के बारे में बताया।

उन्होंने लगभग छह महीने के लिए विशेष स्तनपान की सिफारिश की, और कहा कि फिर 12 महीने या उससे अधिक उम्र तक पूरक खाद्य पदार्थों की शुरुआत करते हुए बच्चे का स्तनपान जारी रखें।

प्रोफेसर एम अतहर अंसारी, प्रोफेसर नजम खलीक, डॉ उज्मा इरम, प्राचार्य, नर्सिंग कॉलेज प्रोफेसर फरहा आज़मी और कार्यक्रम संयोजक डॉ समीना अहमद ने बताया कि कैसे स्तनपान सप्ताह के दौरान जागरूकता कार्यक्रम न केवल लोगों को बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार के बारे में जागरूक बनाते हैं, बल्कि वे कहीं भी और किसी भी समय महिलाओं को स्तनपान कराने के अधिकारों का समर्थन करने में महत्वपूर्ण हैं।

डॉ उज्मा एरम ने कहा कि डॉ नफीस फैजी द्वारा आयोजित ड्राइंग और प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिताएं कार्यक्रम के महत्वपूर्ण आकर्षण थीं। शिक्षकों ने स्वास्थ्य वार्ता भी प्रस्तुत किये और लोगों को स्तनपान के प्रति जागरूक बनाने के लिए एक रैली का आयोजन किया गया। जूनियर प्राइमरी स्कूल, जवान के छात्रों द्वारा स्तनपान और बच्चे के पोषण के महत्व पर एक ‘नुक्कड़ नाटक’ का भी मंचन किया गया।

इस बीच अजमल खां तिब्बिया कालिज अमराज़-ए-निस्वान-व-अत्फ़ाल विभाग द्वारा स्तनपान सप्ताह के उपलक्ष में आयोजित विभिन्न जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किये गये।

अमराज़-ए-निस्वान-व-अत्फ़ल विभाग की अध्यक्ष, प्रोफेसर सुबूही मुस्तफा ने कहा कि स्तनपान के महत्व पर विजुअल एड्स, प्रसवपूर्व देखभाल के लिए पर्चा वितरण और परामर्श सप्ताह भर आयोजित होने वाले कार्यकर्मों के महत्वपूर्ण आकर्षण थे। उन्होंने बताया कि यह कार्यक्रम आजादी का अमृत महोत्सव कार्यक्रम के तहत आयोजित किया गया।

प्रोफेसर सैयदा आमिना नाज़, डॉ एम अनस, डॉ दीवान इसरार खान, डॉ फहमीदा जीनत और डॉ अबीहा अहमद खान ने प्रभावी तरीके से माताओं और बच्चों को सहायता प्रदान करने के लिए जनता को शिक्षित करने के लिए ज़ोर डाला।

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‘वायु गुणवत्ता मॉडलिंगः सिद्धांत और व्यवहार’ पर एएमयू के सिविल इंजीनियरिंग विभाग में ज्ञान पाठ्यक्रम

अलीगढ़, 7 अगस्तः अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के सिविल इंजीनियरिंग विभाग द्वारा आयोजित पांच दिवसीय ग्लोबल इनिशिएटिव ऑफ एकेडमिक नेटवर्क्स (जीआईएएन) कोर्स में प्रतिभागियों को परिवेशी वायु गुणवत्ता को प्रभावित करने के लिए वायु प्रदूषक कैसे फैलते हैं और वातावरण में कैसे प्रतिक्रिया करते हैं, के बारे में बताया गया।

पाठ्यक्रम के लिए अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक, प्रोफेसर अशोक कुमार (टोलेडो विश्वविद्यालय, ऑहियो, यूएसए) ने छात्रों को वायु प्रदूषकों को प्रभावित करने वाली भौतिक और रासायनिक प्रक्रियाओं का अनुकरण करने के लिए वायु गुणवत्ता मॉडल और संख्यात्मक तकनीकों का उपयोग करने के बारे में बताया।

आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर, डॉ मुकेश शर्मा, जो पाठ्यक्रम के राष्ट्रीय शिक्षक थे, ने बताया कि कैसे मॉडल प्राथमिक प्रदूषकों को चिह्नित करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं जो सीधे वातावरण में उत्सर्जित होते हैं और कुछ मामलों में, माध्यमिक प्रदूषक जो वातावरण में जटिल रसायनिक प्रतिक्रियाओं के कारण उत्पन्न होते हैं।

समापन समारोह में, एएमयू सहकुलपति प्रोफेसर मोहम्मद गुलरेज़ ने कहा कि मुझे यकीन है कि इस कोर्स ने प्रतिभागी छात्रों को एक सीखने की सहयोगात्मक प्रक्रिया और विषय विशेषज्ञों के साथ अपने विचार साझा करने के अवसर प्रदान किए हैं।

समापन समारोह के मुख्य अतिथि श्री गौरव दयाल (आईएएस अधिकारी और अलीगढ़ आयुक्त) ने वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन पर बात की।

इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी संकाय के डीन, प्रोफेसर अल्तमश सिद्दीकी ने जोर दिया कि जीआईएएन पाठ्यक्रम विशिष्ट क्षेत्रों में पेश किए जाते हैं और बहुत विशिष्ट और लक्षित होते हैं। इन पाठ्यक्रमों में भाग लेने से छात्रों को उनके क्षेत्र के विभिन्न पहलुओं की जानकारी प्राप्त होती है और उन्हें किसी विषय के बारे में शीघ्रता से जानने में मदद मिलती है।

पाठ्यक्रम समन्वयक, प्रोफेसर इज़हारुल हक फारूकी ने कहा कि इस कोर्स के आयोजन का उद्देश्य देश के मौजूदा शैक्षणिक संसाधनों को बढ़ाने, गुणवत्ता सुधारों की गति में तेजी लाने और भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमताओं को और मजबूत बनाने के लिए वैज्ञानिकों और उद्यमियों के एक प्रतिभा पूल का दोहन करना था।

प्रोफेसर इज़हारुल हक फ़ारूक़ी और प्रोफेसर अनवर खुर्शीद (किंग सऊद विश्वविद्यालय, सऊदी अरब) ने धन्यवाद प्रस्ताव दिया।

आईआईटी रुड़की, एमएनआईटी जयपुर, डब्ल्यूआरआई, जामिया मिलिया इस्लामिया (नई दिल्ली), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (नई दिल्ली), नेताजी सुभाष चंद विश्वविद्यालय, दिल्ली तकनीकी विश्वविद्यालय, जजान विश्वविद्यालय (सऊदी अरब) और एएमयू के 40 से अधिक छात्र प्रतिभागियों ने विभिन्न सत्रों में भाग लिया।

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अमराज़-ए-निस्वान-व-अत्फ़ाल डॉक्टरों के लिए अजमल खां तिब्बिया कालिज में सीएमई संपन्न

अलीगढ़, 7 अगस्तः अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के यूनानी चिकित्सा संकाय के अमराज़-ए-निस्वान-वा-अत्फ़ाल (स्त्री एवं बाल रोग) द्वारा ‘इल्मुल कबालत-वा-अमराज-ए-निस्वान’ डॉक्टरों को उनके क्षेत्र में नए चिकित्सा अनुसंधान की समझ प्रदान करने के उद्देश्य से आयोजित छह दिवसीय सतत चिकित्सा शिक्षा (सीएमई) कार्यक्रम में रिसोर्स पर्सनों ने विषय के विभिन्न आयामों के बारे में जानकारी प्रदान की। सीएमई कार्यक्रम आयुष मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के तहत आयोजित किया गया था।

प्रोफेसर तकीन रब्बानी (जेएन मेडिकल कॉलेज, एएमयू) ने ‘गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप’ पर एक प्रस्तुति दी, प्रोफेसर कौसर उस्मान (केजीएमसी, लखनऊ) ने ‘गर्भावस्था में एनीमिया’ पर बात की, प्रोफेसर जेहरा मोहसिन (जेएन मेडिकल कॉलेज, एएमयू) ने ‘सीटीजी इंटरप्रिटेशन्स’ पर एक सत्र का संचालन किया, प्रो एमए जाफरी (जामिया हमदर्द) ने ‘अमराज-ए-निस्वान-व-कबालात में शिक्षण पद्धति’ पर चर्चा, डॉ सोहराब अहमद (जामिया हमदर्द) ने ‘एंटीनल और पोस्ट नेटल केयर पर फिजियोथेरेप्यूटिक परिप्रेक्ष्य’ पर एक प्रजेंटेशन दिया।

और प्रो एम इदरीस (ए एंड यू तिब्बिया कॉलेज, नई दिल्ली) ने ‘अमराज-ए-निस्वान के प्रबंधन में यूनानी फार्मास्युटिकल इंटरवेंशन’, डॉ मोहम्मद काशिफ हुसैन (एनआरआईयूएमएसडी, हैदराबाद), डॉ मंजूर अहमद (जेडवीएमयूएम, पुणे), डॉ फ़ारूक़ अहमद डार (एकेटीसी, एएमयू), प्रोफेसर एस नफीस बानो (एचएसजेडएचयूएम कॉलेज और अस्पताल, भोपाल) और डॉ जरीना खातून ने भी महत्वपूर्ण व्याख्यान और प्रजेंटेशन दिये।

उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि प्रो नईमा खातून (प्रिंसिपल, विमेंस कॉलेज) ने कहा कि परिवारों और समुदायों का स्वास्थ्य निस्संदेह महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। उनकी भलाई से उनके बच्चों और परिवारों के स्वास्थ्य में सुधार होता है। उन्होंने उन मनोवैज्ञानिक मुद्दों पर भी बात की जिनसे महिलाएं स्वास्थ्य समस्याओं के कारण गुजरती हैं।

सीएमई कार्यक्रमों के महत्व पर बोलते हुए मानद अतिथि प्रोफेसर मोहम्मद मोहिबुल हक सिद्दीकी (इलाज बित तदबीर विभाग के संस्थापक अध्यक्ष) ने कहा कि सतत चिकित्सा शिक्षा स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को नए व्यवहारिक तरीके सीखने का अवसर प्रदान करती है।

यूनानी चिकित्सा संकाय के डीन प्रोफेसर एफ एस शेरानी ने कहा कि गरीबी, सामाजिक बहिष्कार, बेरोजगारी, खराब कामकाजी परिस्थितियों और लैंगिक असमानताओं ने महिलाओं के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डाला है।

प्रिंसिपल, एकेटीसी, प्रो शगुफ्ता अलीम ने वृद्ध महिला रोगियों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और बनाए रखने के तरीकों पर चर्चा की।

प्रो सुबूही मुस्तफा (सीएमई आयोजन सचिव) ने सीएमई रिपोर्ट प्रस्तुत की तथा छह दिन तक चली सीएमई के बारे में बताया और प्रो सैयदा आमिना नाज़ (सीएमई सह-आयोजन सचिव) ने स्वागत भाषण दिया।

कार्यक्रम के संयोजक, डॉ मोहम्मद अनस ने बताया कि कैसे महिलाओं को प्रभावित करने वाली कई बीमारियों को उचित देखभाल से रोका जा सकता है।

डॉ फहमीदा ज़ीनत ने धन्यवाद ज्ञापन किया।


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