#रक्षाबंधन का त्यौहार इस वर्ष 12अगस्त शुक्रवार को मनाना श्रेष्ठ रहेगा: प0 मनोज मिश्रा

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इस वर्ष रक्षाबंधन पर्व को मनाने के लिए जनमानस में काफी भ्रांति फैली हुई है कि रक्षा बंधन पर्व 11 अगस्त को मनाया जाए या 12 अगस्त को

 अलीगढ मीडिया डॉट कॉम, न्यूज़ ब्यूरो, अलीगढ़| समाजसेवी भुवनेश वार्ष्णेय आधुनिक ने इस संबंध में प्रमुख विद्वानों की राय ली । इसी क्रम में श्री वार्ष्णेय मंदिर के महंत पंडित मनोज मिश्रा से विस्तृत वार्ता भी की ।

श्री वार्ष्णेय मंदिर के महंत पंडित मनोज मिश्रा ने कहा कि इस वर्ष रक्षाबंधन पर्व 12 अगस्त को मनाना ही श्रेयस्कर रहेगा , कारण कि 11 तारीख गुरुवार को पूर्णिमा तिथि प्रातः 09:35 से लगेगी, और उसी समय से भद्रा भी शुरू हो रही है जो रात्रि में 8:53 तक रहेगी और दूसरे दिन अर्थात 12/8/2022  को प्रातः 7:16 तक पूर्णिमा रहेगी। अतः  भद्रा के अंदर में ना ही तो कोई मांगलिक कार्यक्रम होते हैं , ना ही रक्षाबंधन का , ना ही तो सोना पूजन जिमाने का कार्यक्रम हो सकता है। 

पंडित मनोज मिश्रा ने आगे बताया कि इसलिए दूसरे दिन 12 तारीख शुक्रवार को ही रक्षाबंधन का त्योहार मनाना श्रेष्ठ रहेगा।

यदि कोई व्यक्ति रक्षाबंधन - सोना पूजन  जिमाने  का काम 11 तारीख रात्रि काल को करता है तो कर सकता है। लेकिन रात 8:53 के पश्चात। उदया तिथि पूर्णिमा 12 अगस्त 2022 दिन शुक्रवार को प्रातः 7:16 बजे तक है अतः12 अगस्त शुक्रवार को 7:16 बजे तक रक्षाबंधन और सोना पूजन व जिमाने का कार्य करें । अपने घर को सगुण करके उदया तिथि के हिसाब से दिन भर रक्षाबंधन का कार्य चलता रहेगा। शास्त्रों में यही कहा गया है कि जो उदया तिथि है उसी का मान दिन भर रहेगा।  अतः मांगलिक कार्य पूरे दिन मनाया जाएगा। इसलिए रक्षाबंधन का त्यौहार एवं श्रावणी कर्म आप लोग इस वर्ष 12 अगस्त 2022 दिन शुक्रवार को ही मनाएं पूरा दिन शुद्ध रहेगा।  


भुवनेश आधुनिक के प्रश्न

भद्रा में क्यों नहीं बांधी जाती राखी? पर जबाब देते हुए प0 मनोज मिश्रा ने कहा कि रक्षाबंधन पर भद्राकाल में राखी नहीं बांधनी चाहिए। 

भद्रा कौन है, क्या है इसकी कथा जानें , पुराणों में भद्रा को लेकर जो कथा मिलती है उसके अनुसार, भद्रा सूर्यदेव की पुत्री और शनि की बहन हैं। कहते हैं जिस तरह से शनि का स्वभाव थोड़ा सख्त था उसी तरह भद्रा भी स्वभाव से थोड़ी कड़क मिजाज थी। भद्रा को काफी क्रोधी स्वभाव का बताया गया है। इनके स्वभाव को काबू करने के लिए ही ब्रह्माजी ने उन्हें पंचांग में विष्टि करण के रूप में जगह दी। दरअसल, भद्रा देवी एक समय पूरे संसार को अपना निवाला बनाने वाली थी। इसी वजह से वह सभी कार्यों में बाधा डालने लगी। इसके बाद उन्हें ब्रह्मा जी ने समझाया और उन्हें करणों में 7वे करण विष्टि के रूप में जगह दी। कहा जाता है कि भद्रा का तीनों लोकों में वास होता है। ये हर समय तीनों लोकों में विचरण करती रहती है। जहां जिस लोक में भद्रा होती है उस समय उस लोक में शुभ काम नहीं किया जाता है। इसकी वजह यह है कि भद्रा काल में किए गए काम का परिणाम शुभ नहीं होता है। रक्षाबंधन के दिन भद्रा का पृथ्वी पर वास रहेगा इसलिए कहा जा रहा है कि भद्रा के समय रक्षाबंधन का पर्व मनाना शुभ नहीं होगा। 

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