पत्रकार संगठन की आड़ में महिला ने SSP दफ़्तर के बाहर दौड़ा-दौड़ाकर पीटे पत्रकार, देखिये... पूरा वीडियो!

Aligarh Media Desk

अलीगढ मीडिया डिजिटल, अलीगढ़| जरा उस पीड़ित के नजरिए से सोचिए, जो थाने से ठोकर खा उम्मीद की आखिरी डोर थामे कप्तान के दरवाजे पर पहुंचे और अपनी ही आँखों के सामने उसी VIP सुरक्षित घेरे में किसी और को 'पीड़ित' बनते देख ले। तो वह क्या सोचेगा! और उसे लगेगा कि यहाँ इंसाफ मिलेगा? यह बताने या आपको समझने में कोई परेशानी नहीं हो रही होंगी कि अगर कप्तान के साये में कोई सुरक्षित नहीं, तो इस पूरे जिले में कानून सिर्फ एक मजाक है।

अलीगढ़ जिले के एसएसपी कार्यालय के बाहर से वायरल वीडियो में SSP कार्यालय के बाहर एक 'कलम की ताकत महासंघ' से जुड़ी कुछ कथित महिला पत्रकार या यूं कहे गुंडों ने दो पत्रकारों के साथ मारपीट कर दी। वीडियो में साफ दिख रहा है कि हंगामा हो रहा है, हाथापाई हो रही है, और पुलिस वहीं मौजूद है| लेकिन दखल देने की बजाय मूकदर्शक बनी नजर आ रही है।

इस पूरी घटना का सबसे खास पहलू मौक़े पर खड़े होकर इस हिंसक तमाशे का आनंद ले रहे दर्जनों पुलिकर्मी भी रहे, जिनके खिलाफ अब कार्रवाई की तलवार लटक गयी है। वायरल वीडियो को देखकर ऐसा लगता है मानो किसी ने उन्हें सख्त हिदायत दी गई हो कि "जब तक मनोरंजन चरम पर न पहुँच जाए, बीच में दखल न दें।" और हुआ भी ऐसा ही| यहाँ पीटने वाला एक पत्रकार को मौक़े से भगाना पड़ा और दूसरा रहम की भीख मांगता दिखा|

जब रक्षक ही 'मूकदर्शक' बन जाए, तो पीड़ित के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि "अगर कप्तान की दहलीज पर मैं सुरक्षित नहीं हूँ, तो पूरे शहर में मेरी सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा?"


अगर पुलिस कप्तान के कार्यालय में फरियादी सुरक्षित नहीं है, तो अलीगढ़ की गलियों में आम आदमी अपनी सुरक्षा की भीख किससे मांगे? यह घटना केवल मारपीट नहीं, बल्कि जिले की कानून-व्यवस्था का 'लाइव चीर हरण' और पत्रकारों की इज्जत का तमाशा है|

यह घटना सिर्फ दो गुटों के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम की विफलता है जिसपर घूसखोरी की जंग लग चुकी है| एक कथित पत्रकार संगठन के गुंडे महिलाओं को ढाल बनाकर पुलिस की मौजूदगी में उस समय इकठ्ठा हो जाते है जब शहर में निषेधाज्ञा (धारा 144, परिवर्तित) लगी हो|