अलीगढ मीडिया डिजिटल, अलीगढ़| जरा उस पीड़ित के नजरिए से सोचिए... जो थाने से ठोकर खाकर, उम्मीद की आखिरी डोर थामे कप्तान के दरवाजे पर पहुंचा हो, और अपनी ही आँखों के सामने उसी सुरक्षित घेरे में किसी और को 'पीड़ित' बनते देख ले। वह क्या सोचेगा? क्या उसे लगेगा कि यहाँ उसे न्याय मिलेगा? या उसे यह समझ आ जाएगा कि अगर कप्तान के साये में कोई सुरक्षित नहीं, तो इस पूरे जिले में कानून सिर्फ एक मजाक है।
अलीगढ़ जिले से सामने आये एक वीडियो में SSP कार्यालय के बाहर एक कलम की ताकत महासंघ से जुड़ी कुछ कथित महिला पत्रकार या यूं कहे गुंडों ने दो पत्रकारों के साथ मारपीट कर दी। वीडियो में साफ दिख रहा है कि हंगामा हो रहा है, हाथापाई हो रही है, और पुलिस वहीं मौजूद है| लेकिन दखल देने की बजाय मूकदर्शक बनी नजर आ रही है।
इस पूरी घटना का सबसे 'शानदार' पहलू वह पुलिसकर्मी थे, जो पास ही खड़े होकर इस हिंसक ड्रामे का आनंद ले रहे थे। वायरल वीडियो को देखकर ऐसा लगता है मानो उन्हें सख्त हिदायत दी गई हो कि "जब तक मनोरंजन चरम पर न पहुँच जाए, बीच में दखल न दें।"
जब रक्षक ही 'मूकदर्शक' बन जाए, तो पीड़ित के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि "अगर कप्तान की दहलीज पर मैं सुरक्षित नहीं हूँ, तो पूरे शहर में मेरी सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा?"
अगर पुलिस कप्तान के कार्यालय में फरियादी सुरक्षित नहीं है, तो अलीगढ़ की गलियों में आम आदमी अपनी सुरक्षा की भीख किससे मांगे? यह घटना केवल मारपीट नहीं, बल्कि जिले की कानून-व्यवस्था का 'लाइव पोस्टमार्टम' और पत्रकारों की इज्जत का तमाशा है|
यह घटना सिर्फ दो गुटों के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम की विफलता है जिसपर घूसखोरी की जंग लग चुकी है| एक कथित पत्रकार संगठन के गुंडे महिलाओं को ढाल बनाकर पुलिस की मौजूदगी में उस समय इकठ्ठा हो जाते है जब शहर में निषेधाज्ञा (धारा 144, परिवर्तित) लगी हो|

